Murli Poems in Hindi

आज की मुरली से कविता (Poem made from today's murli of Shiv baba) - Daily updated. Poems from Brahma Kumar Mukesh bhai (Rajasthan, India). If you have a query or for old poems, contact BK Mukeshbkmukesh1973@gmail.com

 

Below is date wise murli poems. For old murlis, to download/print, visit Murli Poems PDF

 Murli poem 01​

* मुरली कविता दिनाँक 01-10-2020 *

 

अवगुणों का त्याग करके ही, देवता बन पाओगे

विकार नहीं छोड़े तो, महापापी ही कहलाओगे

 

ज्ञान योग का पोता मेल, जितना रखते जाओगे

उतना ही तुम ज्ञान योग में, आगे बढ़ते जाओगे

 

देही अभिमानी नहीं रहे, तो घाटा खाते जाओगे

लक्ष्मी नारायण जैसा, ऊँच पद भी नहीं पाओगे

 

कला उतरती भक्ति की, डूबे हैं पांच विकारों में

फैल गया है प्रदूषण, हर आत्मा के संस्कारों में

 

अब याद करो बाबा को, तो होंगे विकर्म विनाश

सहज रूप से होता जाएगा, विकारों से सन्यास

 

दैवी गुणों की धारणा, तुम निरन्तर करते जाओ

हर आसुरी गुण को, प्रभु याद से मिटाते जाओ

 

होते जन्म विकारों से, ये सारी दुनिया है विकारी

जाना है उसी लोक में, जो है सम्पूर्ण निर्विकारी

 

मेहनत बिना विश्व के, मालिक नहीं बन पाओगे

अलबेलेपन के वश होकर, अपना पद गँवाओगे

 

बाप बच्चे सब हैं बिंदी, मूँझने की नहीं दरकार

बिंदी बनकर रहने से ही, शुद्ध होगा हर संस्कार

 

कर लो बाप से वादा, कोई बुरा काम ना करेंगे

कर्मातीत अवस्था के लिए, याद की रेस करेंगे

 

सर्व खजानों का भण्डारा, सब पर तुम लुटाओ

ज्ञान, शक्ति, खुशी बांटकर, महादानी कहलाओ

 

बाप से ज्ञान सुनकर, उसका मनन करते जाओ

मनन करके स्वयं को, तुम शक्तिशाली बनाओ

 

* ॐ शांति *

 

 Murli poem 02

* मुरली कविता दिनांक 12-08-2020 *

 

दुख़ तो नहीं दिया किसी को जांच करते जाओ

अपने कर्मों का हिसाब चेक करके सोने जाओ

 

भाई भाई होकर रहने वाले भाग्यशाली कहलाते

खुद को आत्मा समझते हुए ही व्यवहार में आते

 

खुल जाते द्वार स्वर्ग के जब बाप धरा पर आते

हम बच्चों को संगमयुग में बाप पुरुषोत्तम बनाते

 

कलियुगी पुरानी दुनिया से अपना दिल उठाओ

केवल सेवार्थ इस शरीर से अपना पार्ट बजाओ

 

हम हैं एक आत्मा बाप ने कराया सत्य एहसास

बाप को याद करने से होंगे हमारे विकर्म विनाश

 

बाप की श्रीमत पर अपनी चलन सुधारते जाओ

लक्ष्मी को वर सको इस लायक खुद को बनाओ

 

अपने पुराने शरीर का तुम संन्यास करते जाओ

अपनी बुद्धि अब पुरानी दुनिया में नहीं लगाओ

 

मन और मुख से सिर्फ बाबा बाबा कहते जाओ

ज्ञान नेत्रों से केवल आत्मा को ही देखते जाओ

 

नीरस माहौल में तुम खुशी की झलक दिखाओ

सदा खुश रहने के वरदान को उपयोग में लाओ

 

शरीर के हर आकर्षण से खुद को मुक्त बनाओ

यही अभ्यास करते हुए तुम अशरीरी बन जाओ

 

*ॐ शांति *

Murli poem 03​

* मुरली कविता दिनांक 24-08-2020 *

 

माया का चम्बा बन जाते मिलकर सभी विकार

इनसे तुम बचते ही जाना रहकर सदा होशियार

 

याद की यात्रा में गफलत मिटाकर चलते जाओ

आत्माभिमानी बनकर काम विकार को हराओ

 

श्रीमत पर चलकर जब पुण्यात्मा बन जाओगे

दु:खधाम तभी छोड़कर सुखधाम को पाओगे

 

बच्चों तुम्हें माया का नाला बहाकर ना ले जाए

बेहद के बाप को बच्चों प्रति यही फुरना सताए

 

श्रीमत पर चलकर तुम पापों का बोझ मिटाओ

सुखधाम चलने के लिए पुण्यात्मा बनते जाओ

 

झूठी दुनिया वाले सच की नांव जरूर हिलाएंगे

किंतु मायावी दुनिया से हम पार निकल जाएंगे

 

काम विकार का महा तूफान बच्चों को सताता

दुनिया में कोई विरला ही इस पर विजय पाता

 

पूरी हुई मुसाफिरी अब हम अपने घर में जाएंगे

इसी खुशी में रहना की हम राजधानी में आएंगे

 

पढ़ाई पढ़कर बन जाएंगे हम स्वर्ग की पटरानी

अपने स्वर्णिम भविष्य की मन में खुशी जगानी

 

अव्यभिचारी याद द्वारा निर्विघ्न स्थिति बनाओ

पहले जन्म की प्रालब्ध से समानता को पाओ

 

साइलेंस का जितना बल खुद में तुम बढ़ाओगे

नेगेटिव से पॉजिटिव में उतना ही बदल पाओगे

 

*ॐ शांति*

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